॥ श्री अर्गला स्तोत्र हिन्दी अनुवाद ॥
ॐ नमश्चण्डिकायै
अर्थात माँ चण्डिका को मेरा नमस्कार।
मार्कण्डेय उवाच
अर्थात ऋषि मार्कण्डेय जी कहते हैं—

श्लोक 1
ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥१॥
हिन्दी अर्थ:
हे माँ! आप जय देने वाली हैं, मंगलमयी हैं, काली हैं, भद्रकाली हैं, कपाल धारण करने वाली हैं।
आप दुर्गा हैं, क्षमा स्वरूपा हैं, कल्याणमयी शिवा हैं, सबका पालन करने वाली धात्री हैं।
आप स्वाहा और स्वधा रूपिणी हैं। आपको बार-बार प्रणाम है।
श्लोक 2
जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि।
जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते॥२॥
हिन्दी अर्थ:
हे देवी चामुण्डा! आपकी जय हो।
हे प्राणियों के दुःख दूर करने वाली माता! आपकी जय हो।
हे सर्वव्यापी देवी! हे कालरात्रि स्वरूपिणी! आपको प्रणाम है।
श्लोक 3
मधुकैटभविद्रावि विधातृवरदे नमः।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥३॥
हिन्दी अर्थ:
हे मधु और कैटभ दैत्यों का नाश करने वाली तथा ब्रह्माजी को वर देने वाली देवी! आपको नमस्कार।
मुझे दिव्य आभा दो, विजय दो, यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
श्लोक 4
महिषासुरनिर्नाशि भक्तानां सुखदे नमः।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥४॥
हिन्दी अर्थ:
हे महिषासुर का संहार करने वाली और भक्तों को सुख देने वाली माता! आपको नमस्कार।
मुझे रूप, विजय,यश दो और शत्रुओं का नाश करो।
श्लोक 5
रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥५॥
हिन्दी अर्थ:
हे रक्तबीज का वध करने वाली और चण्ड-मुण्ड का विनाश करने वाली देवी!
मुझे रूप विजय और यश दो और और मेरे शत्रुओं का नाश करो।
श्लोक 6
शुम्भस्यैव निशुम्भस्य धूम्राक्षस्य च मर्दिनि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥६॥
हिन्दी अर्थ:
हे शुम्भ, निशुम्भ और धूम्राक्ष जैसे दैत्यों का दमन करने वाली माता!
मुझे रूप विजय और यश दो और और मेरे शत्रुओं का नाश करो।
श्लोक 7
वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥७॥
हिन्दी अर्थ:
हे देवी! जिनके दोनों चरण सबके द्वारा वंदित हैं, जो सभी प्रकार का सौभाग्य देने वाली हैं—
मुझे रूप विजय और यश दो और और मेरे शत्रुओं का नाश करो।
श्लोक 8
अचिन्त्यरूपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥८॥
हिन्दी अर्थ:
हे देवी! आपका रूप और चरित्र अचिन्तनीय (अलौकिक) है।
आप सभी शत्रुओं का नाश करने वाली हैं।
मुझे रूप विजय और यश दो और और मेरे शत्रुओं का नाश करो।
श्लोक 9
नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चण्डिके दुरितापहे।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥९॥
हिन्दी अर्थ:
हे चण्डिके! जो भक्तिपूर्वक आपके सामने झुकते हैं, उनके पाप और कष्ट दूर करती हैं।
मुझे रूप विजय और यश दो और और मेरे शत्रुओं का नाश करो।
श्लोक 10
स्तुवद्भ्यो भक्तिपूर्वं त्वां चण्डिके व्याधिनाशिनि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१०॥
हिन्दी अर्थ:
हे चण्डिके! जो भक्तिभाव से आपकी स्तुति करते हैं, उनके रोगों का नाश करने वाली माता!
मुझे रूप विजय और यश दो और और मेरे शत्रुओं का नाश करो।
श्लोक 11
चण्डिके सततं ये त्वामर्चयन्तीह भक्तितः।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥११॥
हिन्दी अर्थ:
हे चण्डिके! जो लोग इस संसार में निरंतर भक्तिभाव से आपकी पूजा करते हैं—
मुझे रूप विजय और यश दो और और मेरे शत्रुओं का नाश करो।
श्लोक 12
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१२॥
हिन्दी अर्थ:
हे माता! मुझे सौभाग्य दें, आरोग्य (स्वास्थ्य) दें और परम सुख प्रदान करें।
मुझे रूप विजय और यश दो और और मेरे शत्रुओं का नाश करो।
श्लोक 13
विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१३॥
हिन्दी अर्थ:
मेरे शत्रुओं का नाश करें और मुझे महान बल प्रदान करें।
मुझे रूप विजय और यश दो और और मेरे शत्रुओं का नाश करो।
श्लोक 14
विधेहि देवि कल्याणं विधेहि विपुलां श्रियम्।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१४॥
हिन्दी अर्थ:
हे देवी! मेरा कल्याण करें और मुझे विपुल (बहुत अधिक) लक्ष्मी/समृद्धि दें।
मुझे रूप विजय और यश दो और और मेरे शत्रुओं का नाश करो।
श्लोक 15
विधेहि द्विषतां बुद्धिं नाशयाशु दुरात्मनाम्।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१५॥
हिन्दी अर्थ:
दुष्ट और शत्रुभाव रखने वालों की बुद्धि का नाश करें।
मुझे रूप विजय और यश दो और और मेरे शत्रुओं का नाश करो।
श्लोक 16
सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणाम्बिके।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१६॥
हिन्दी अर्थ:
हे अम्बिके! देवताओं और असुरों के मुकुटों के रत्नों से जिनके चरण स्पर्शित होते हैं—
ऐसी महान देवी! मुझे रूप विजय और यश दो और और मेरे शत्रुओं का नाश करो।
श्लोक 17
विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तं जनं कुरु।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१७॥
हिन्दी अर्थ:
मुझे विद्वान, यशस्वी और धन-सम्पन्न बनाइए।
मुझे रूप विजय और यश दो और और मेरे शत्रुओं का नाश करो।
श्लोक 18
प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१८॥
हिन्दी अर्थ:
हे चण्डिके! प्रचण्ड दैत्यों के घमंड का नाश करने वाली माता, मैं आपके चरणों में झुका हूँ।
मुझे रूप विजय और यश दो और और मेरे शत्रुओ का नाश करो ।
श्लोक 19
चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रसंस्तुते परमेश्वरि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१९॥
हिन्दी अर्थ:
हे चार भुजाओं वाली, चार मुख वाले ब्रह्मा द्वारा स्तुत की जाने वाली परमेश्वरी!
मुझे रूप विजय और यश दो और और मेरे शत्रुओं का नाश करो।
श्लोक 20
कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वद्भक्त्या सदाम्बिके।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥२०॥
हिन्दी अर्थ:
हे अम्बिके! भगवान कृष्ण द्वारा सदा भक्तिभाव से स्तुत की जाने वाली देवी!
मुझे रूप विजय और यश दो और और मेरे शत्रुओं का नाश करो।
श्लोक 21
हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥२१॥
हिन्दी अर्थ:
हे परमेश्वरी! हिमाचल की पुत्री पार्वती के स्वामी (भगवान शिव) द्वारा स्तुत की जाने वाली देवी!
मुझे रूप विजय और यश दो और और मेरे शत्रुओं का नाश करो।
श्लोक 22
इन्द्राणिपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥२२॥
हिन्दी अर्थ:
हे परमेश्वरी! इन्द्राणी के पति इन्द्र द्वारा सच्चे भाव से पूजित देवी!
मुझे रूप विजय और यश दो और और मेरे शत्रुओं का नाश करो।
श्लोक 23
देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पविनाशिनि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥२३॥
हिन्दी अर्थ:
हे देवी! अपनी भुजाओं के बाल से राक्षसों का नाश करने वाली माता!
मुझे रूप विजय और यश दो और और मेरे शत्रुओं का नाश करो ।
श्लोक 24
देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदयेऽम्बिके।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥२४॥
हिन्दी अर्थ:
हे अम्बिके! अपने भक्तों को अपार आनंद देने वाली
मुझे रूप विजय और यश दो और और मेरे शत्रुओं का नाश करो
श्लोक 25
पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्।
तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम्॥२५॥
हिन्दी अर्थ:
मुझे ऐसी सुन्दर, मनभावनी, मेरे स्वभाव के अनुरूप चलने वाली, श्रेष्ठ कुल में उत्पन्न पत्नी प्रदान करें,
जो इस कठिन संसार-सागर से पार लगाने वाली हो।
नोट: यह श्लोक प्राचीन गृहस्थ जीवन की भावना को दर्शाता है।
आज के समय में इसका आधुनिक आध्यात्मिक अर्थ ऐसे भी लिया जा सकता है:
“मुझे जीवन में योग्य, सद्गुणी, सहयोगी और धर्ममार्ग पर चलने वाला जीवनसाथी मिले।”
श्लोक 26
इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः।
स तु सप्तशतीसंख्यां वरमाप्नोति सम्पदाम्॥२६॥
हिन्दी अर्थ:
जो मनुष्य इस अर्गला स्तोत्र का पाठ करके फिर महास्तोत्र (दुर्गा सप्तशती) का पाठ करता है,
वह सप्तशती पाठ के समान महान फल और अनेक प्रकार की सम्पत्तियाँ/सिद्धियाँ प्राप्त करता है।

सबसे महत्वपूर्ण पंक्ति का आसान अर्थ
“रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि”
इसका सरल हिन्दी अर्थ:
- रूपं देहि = माँ मुझे तेज सुन्दरता आकर्षण और आभा दो
- जयं देहि = मैं जो कार्य करु उसमें विजय हासिल हो
- यशो देहि = मुझे यश सम्मान और प्रतिष्ठा प्रदान करो
- द्विषो जहि = मेरे शत्रु का नाश करो माँ
गहरा आध्यात्मिक अर्थ
सिर्फ बाहरी शत्रु की बात नहीं हो रही है
- भय
- क्रोध
- अहंकार
- आलस्य
- ईर्ष्या
- नकारात्मक सोच
- मोह
इस पंक्ति का आशय ये है की…
“हे माँ मुझे भीतर और बाहरी दोनों शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने की शक्ति दो।”
Navratri में अर्गला स्तोत्र का भावार्थ (Short Summary)
यह पूरा स्तोत्र माँ दुर्गा से प्रार्थना है कि—
- हमारे दुख दूर हों
- हम निरोगी हो
- हम भयमुक्त रहें
- शत्रुबाधा और अन्य बधाइयां दूर हो
- आध्यात्मिक शक्ति मिले
- जीवन में विजय के साथ आपकी कृपा भी प्राप्त हो